पर रिहाई नही देते दर्द
ऐसा नही है कि चाहा नही जाता कभी
कुछ ऐसा लिखने के बारे में
जिसमें खुशियों की खूशबू आती और महकती रहे
जिसमें लबो पे मुस्कान लहलहाते रहें
मौसमों पे बहार लदे से लगें
और ऐसी ही तमाम चीजें .....
और ऐसा भी नही है कि सिर्फ चाहा ही जाता है
कोशिश नही की जाती
और जानबूझकर कर दिखायी जाती हैं विसंगतियाँ
बहुत कोशिश की जाती है कि
आनंद और उत्सव निकाला जाये
चाहे पीड़ा के गर्भ से
प्रेम्, स्नेह और सौंदर्य बटोरे जाये
छलावो की तहे हटाकर
ऐसा जानबूझ कर भी इसलिए
कि कुछ अच्छी चीजें
शायद कुछ और अच्छी चीजें बहाल कर सकें
और सफलता भी मिलती है कभी कभी
पर दर्द रिहाई नही देते कई बार शब्दों को
अहसास के छाव पे
तपती झुलसती धूप पड जाती है कई बार
कितनी बार तो घुप्प अंधेरा छ जाता है आँखों के पास
फिर क्या करे कोई
अपने आप ढूंढ लिये जाते हैं
तमाम अवसाद्, विसंगतियाँ और विसमताये.

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