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प्रतीक्षा

बहूत टटोली, पर खाली हाथ रहे
ह्थेली में हाथ नही आये

टूंगती रही वक़्त की शाख नजर
पीठ पे ख्वाब लादे चलते रहे नींद

सालो साल
फटी, उघडी हुई देह में, जीते हुए
और
तुम्हारे आने के
आस के आंच को तापते हुए
मैं उस किनारे पे लगी रही
जहा से तेरी धार गुजरनी थी



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