ठहर गया कुछ सोंच कर
तार का वो सिरा तेरे हाथो से छूट गया
तुम्हे देखना पडा उस तरफ और तुम्हारी पीठ
धीरे से मेरी आंखो में धूंधली हो गयी
और पीठ के साथ साथ जिंदगी भी
फिर कई कोशिशें की
कई दिशाओं से देखा
पर जिंदगी साफ दिखायी नही पडी
ठहरी रही वही कोहरे में तार का एक सिरा पकडे
जिसका दूसरा सिरा तेरे हाथो से छूट गया था
कई बार तुम्हारे कदमो के छोडे निशानो पे चल कर
तुम तक पहुंचना चाहा
पर ठहर गया ये सोंच कर
कि तुम्हारी पीठ ही मिलेगी केवल्, अगर जाउंगा
पर वो सिरा नही छूटता तार का कभी
जो जोडती थी हमे
और जोडती है हमे.

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