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4 अप्रैल, 2008


ब्लॉग्स (2)
बहूत टटोली, पर खाली हाथ रहेह्थेली में हाथ नही आयेटूंगती रही वक़्त की शाख नजरपीठ पे ख्वाब लादे चलते रहे नींदसालो सालफटी, उघडी हुई देह में, जीते हुएऔरतुम्हारे आने केआस के आंच को तापते हुएमैं उस किनारे पे लगी रहीजहा से तेरी धार गुजरनी थी और पढ़ें...

तार का वो सिरा तेरे हाथो से छूट गयातुम्हे देखना पडा उस तरफ और तुम्हारी पीठ धीरे से मेरी आंखो में धूंधली हो गयी और पीठ के साथ साथ जिंदगी भीफिर कई कोशिशें कीकई दिशाओं से देखा पर जिंदगी साफ दिखायी नही पडी ठहरी रही वही कोहरे में तार का एक सिरा पकडेजिसका ... और पढ़ें...