चील से उडते हैं मौसम
जैसे झपट्टा मारने को हो
अलसायी पडी जिंदगी सुखती रहती है टहनी पे
जम्हाई लेती दुपहरी के रोशनदानो से झुलसी हुई हवा का आना लगा रहता है
दीवारे तपती रहती है अल्लसुबह से
भीतर ही भीतर
धाह मारती रहती है
भिंगोता हूँ, पानी छिडकता हूँ पर धूल थमती नही
जिंदगी सब्ज नही होती
शाखे बिना कोंपलो के डोलती रहती है
वो अपने छाव जो ले गयी है

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