शामें ढल जाया करती हैं तेरे बगैर अक्सर, अक्सर ही तेरे बगैर !जो ढल जाया करती हैं शामें तेरे बगैर मत पूछो कि उन शामो की रातों का क्या होता है कैसे नीली पड़ी रहती है उसकी देह जैसे कोई जख्म उभरते उभरते रह गया हो भीतर का दर्द बाहर न आ पाया हो जैसेजैसे बिस्तर ...
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