कहानी को जरा फिर से बुनना है
कहानी को जरा फिर से बुनना है
कहानी की एक अच्छी शुरूआत होनी ही चाहिये
ताकि सुनने सुनाने में अच्छी लगे
काट्- छांट कर अलग करना है
उलटी पुलटी चीजो को
संडे, गंधाते हिस्सो को
जो फालतू में जगह घेरती है कहानी में
और प्रस्तुति को भद्दा बनाती है
कुछ शब्दो में जान फूंकनी है
कुछ को सीलन से बचाना है
कहानी कोइ बने जो
कोशिश करती हो, सिर्फ वकालत नही
बोलती हो, आवाज उठाती हो
और लडती हो जरूरत पडने पर
घिघियाने को जरा हटाना है कहानी से
दूसरा कोइ भी
नही बदल सकता इंच भर भी मेरी कहानी को
इसलिये मुझे ही करना होगा कुछ
इस कहानी को डरपोक होने से बचाने के लिये
आखिर ये कहानी भी तो मेरी है.

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