मिल गयी तेरी उँगलियाँ
थाम कर चलने के लिये
मंजिल या ठिकाने में और क्या होता है
इस एहसास के अलावा कि
कोइ है जो
गर कभी लम्हे लडखडाये तो थाम लेंगे
कि कोई है
जिसके कांधे पे वजूद टिकाया जा सकता है
जिसकी हथेली में थमाया जा सकता है अपना क्षितिज
और पाया जा सकता है कोई नूरी स्पर्श
जिसके कागज पे लिखी और पढी जा सकती है
तमन्नाओ की इबारते
और जिसकी आँखों से बहा जा सकता हो धार बनकर
कभी मौका हो तो
और क्या होता है मंजिल या ठिकाने में !
शुक्रिया इस विराट सृष्टि का जिसमे ये सब घटित हुआ
शुक्रिया उस राह का
जिस पर चलते हुए जिंदगी को वो उँगलियाँ मिली
शुक्रिया उस तलाश का जो पूरी हुई
और शुक्रिया तुम्हारा
जो मेरे हाथ अपने हाथ में आने दिये.
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
2008
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