जहाँ तक देखना हो पाता है
दिख जाती हैं
वेदनाये बिखरी पडी हुईं
गोल, चौकोर या लम्बोतरे चेहरे में
कभी सडक के किनारे
या रेल्वे प्लैट्फार्म पर
कचरा घर के आस - पास
चाहरदीवारी के बाजू में
घर के कोनों अंतरों में
दराजो के नीचे
दरवाजो के पीछे
कई बार पुछता हूँ उनसे
वे कहाँ से आती हैं और क्यों पड़ी रहती हैं जहाँ तहान
पर वे अवाक सी पड़ीं रहती हैं
और
सम्वेदना है जो पूरी नही होती
बिना इनकी कुछ सुने
ये बेसुरी और बेताल वेदनाये
चीखो में ही बोलती हैं
या रहती है अवाक
जाने कब तक बोलती रहेगी ये चीखो में
और कब तक समझ पाउंगा इनको
और कब पूरी होगी मेरी सम्वेदना

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