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18 मार्च, 2008

 

• अधूरी सम्वेदनाये

जहाँ तक देखना हो पाता है दिख जाती हैं वेदनाये बिखरी पडी हुईंगोल, चौकोर या लम्बोतरे चेहरे में कभी सडक के किनारेया रेल्वे प्लैट्फार्म परकचरा घर के आस - पास चाहरदीवारी के बाजू मेंघर के कोनों अंतरों में दराजो के नीचेदरवाजो के पीछे कई बार पुछता हूँ उनसेवे ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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