मिल बैठ कर बात कर लेते हैं
जब मन भरा बादल हो जाता है
साथ में बरसना भी हो जाता है कभीकभार
जब पुरवइया के झोंके विरहा गाते हैं
कभी पुराने समय के हिसाब में
खुशियों को दे दी गयी चुनौतियाँ
मार दी गयी चुन चुन कर उनकी किलकारिया
खौफ की डुगडुगी डंके की चोट पर बजायी गयी
लहू बहाये गये
घर के दीवारो से लग कर सिसकिया बोलती रहीं
पर कहीं कोई कान नही हुआ मौजूद
धरती के सीने पे दर्दो के चकत्ते बडे होते गये
चक्कर खा कर
गिरते रहे हौसले और विश्वास के वजूद
और एक समय तक बंधे हुए सारे बांध टूट गये
जो बह गये पानी
उन्हीं की याद में वे
मिल बैठ कर बात कर लेते हैं
और बरस लेते हैं
जब मन भरा बादल हो जाता है.

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