ताल्लुकात सिमटते गये
धीरे - धीरे किताब के किरदारो से
खुद से मिलता जुलता, कोइ मामुली सा
या कोइ हैरत अंगेज सा किरदार
मिल जाया करते थे अक्सर
किताब के पन्नो में
वे किरदार जीवित हैं आज भी
और वक़्त-बेवक़्त मिल जाया करते है
किसी सहारे की तरह
और उंगली थाम कर चलने लगते हैं.
कभी कभी कोइ किरदार आज भी
नजर आता है मुस्कुराते हुए
कभी सोफे पे, कभी पलंग पे
पूरी आत्मियता के साथ हाथ बढाये हुए
कभी कभी कोइ किरदार इतना छू जाता था
कि उनका स्पर्श जैसे जम सा जाता था मानस पे
और छुअन तो जैसे देर रात में कोइ राग मालकौंस
तब वक़्त में खाली जगह हुआ करती थी
जहाँ वो बैठ सकें, गप-शप कर सकें
चाय पी सकें, नमकीन खा सकें
अब ठंसे पड़े रहते हैं कलैंडर
हालाँकि ज्यादातर वहाँ रद्दी सा है
और असलियत से काफी जुदा भी
पर वे हैं पड़े
जहाँ कभी किताबों के लिये
और उनके किरदारों के लिये जगह रहती थी.

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