उसने कहना छोड़ दिया
और मैने भी
वो सारे शोर जो कभी कमरे और उनसे निकल कर बरामदे में तक पहुँचते थे ,
भीतर ही उमड़ने घूमड़ने लगे
गुबार बनकर
पर
खिड़किया खुली नही किसी भी दिवार पे
वे बरसे भी पर भीतर ही
या किसी अलग कोने में जाकर
पानी अलग अलग धाराओं में बह कर दूर निकल गये
पर वे कभी मोकाम तक नही पहुँच सके
दोनो सोंचते हैं
काश ! कहना जारी रखते
.

लोड हो रहा है...
प्रतिक्रियाएँ