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जाने क्यों !





उसने कहना छोड़ दिया
और मैने भी

वो सारे शोर जो कभी कमरे और उनसे निकल कर बरामदे में तक पहुँचते थे ,
भीतर ही उमड़ने घूमड़ने लगे
गुबार बनकर
पर
खिड़किया खुली नही किसी भी दिवार पे

वे बरसे भी पर भीतर ही
या किसी अलग कोने में जाकर

पानी अलग अलग धाराओं में बह कर दूर निकल गये

पर वे कभी मोकाम तक नही पहुँच सके

दोनो सोंचते हैं
काश ! कहना जारी रखते
.



प्रतिक्रियाएँ

Re: जाने क्यों !
बेहद सुंदर कविताएँ......बेहद संजीदा शब्द......आपकी कविताएँ पढ़कर एक बात याद आती है- "मैंने अंटॉर्कटिक देखा नहीं, लिखा....जिसने देखा होगा, पढ़ते ही वह तैरने लगा होगा." ब्लॉग्स की इतनी भीड़ में एक यही ब्लॉग है जिससे भावनाओं के लिगामेंट्स बहुत आसानी से जुड़ गये हैं.
अस्वीकरण