दरारें बनाती हैं ख्वाब नींद में
एक लम्स छू गया था कल ख्वाब में
सुहाने एक मौसम की तरह
और उसे ढूँढता रहा हूँ मै नींद नींद आज
कल कोई और छू जायेगा
और कल कोई और तलाश
ख्वाब कइ देखे
और खोजा भी कि शायद रूबरू हो कभी
पर कोई कितना भागे
और किसके पीछे
ख्वाब भी तो बदलते रहते हैं
एक के बाद एक ख्वाब और एक के बाद एक तलाश
और नतीजतन
अब सैकड़ों दरारें हैं नींद में

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