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ये बातें
जिनका अस्तित्व मौन में है
जीवित हैं इस उम्मीद में
कि किसी दिन तुम्हारी छुअन
इन्हे मिल जाए शायद.
ये बातें किसी दायरे में नहीं
उनके सपने हैं निराकार
इन बातों का बयान सुना जाना है अभी बाकी
ये बातें फ़िज़ा में भटकती रहती है
बेचैनी से साँसें लेते हुए
बदते हुए शोर के बीच
इनका दम घूँटता रहता है
कभी वक़्त मिले तो
छू कर इन्हे थोड़े ताज़े मौन दे देना.

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प्रतिसाद