मुद्दत से आरजू है की तेरी चाँदनी में रहूँ.
तुम छेड़ो कोई तार की मैं जिसकी रागिनी में रहूँ
हर तरफ तेरी लिखावट हो और,
मैं तो बस सदा उसकी स्याही में रहूँ
कभी उठे लहर तो गिरे कभी फिर उठने के लिए,
मैं हमेशा उसके पानी में रहूँ.
खुदा के रहेम-ओ-करम तुम पर मुसलसल बरसते रहे,
और मैं हमेशा उसकी वांदगी में रहूँ.
कभी फूल तू, कभी पत्ता और कभी छतनार बरगद हो,
हर हाल में मैं तेरी नमी में रहूँ.
हो तेरी खूबसूरती के चर्चे तमाम शहर में,
मैं तेरे हुस्न की सादगी में रहूँ
और अर्ज़ है आखिर में की ....
तेरे दिए की लाउ कभी बुझने ना पाए,
और मैं हमेशा उसकी रोसनी में रहूँ.
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