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लुप्त होते ख्वाब





सुबह पर धूप ने अभी अभी चादर लपेटी है.
दूब पर बैठे ओस के परिंदे अपने पर फैलाने लगे हैं.

ख्वाब भी नींद की आरामगाह से निकल कर
अपने-अपने तलाश में निकल कर
सड़कों पे दौड़ने लगे हैं.
अपनी अपनी गति से,
अपनी अपनी उम्मीद और धुन में,
अपने अपने पेट्रोल के सहारे.

एक सड़क पे एक साथ दौड़ते ख्वाबों क़ी भी बहुत जुदा है मंज़िल ,
बहुत जुदा है हाथ, कंधे और आँख

इतने तीव्र और बेचैन हैं वे कि
अपने लहू की कराहें भी सुनाई नही पड़ती.
या अनसुनी कर देते हैं कि दौड़ में आगे निकल सकें.

कोई बताए उन्हे
याद दिलाए कि वे ख्वाब हैं
फुर्सत और नींद ज़रूरी है उनके लिए.
वरना वे शीघ्र हीं स्खलित हो जाएँगे
और उनकी अगली पीढ़ी कगार पे होंगी.
अस्वीकरण