दुनिया किसी किनारे पे खत्म नही होती
ऐसा कहते हैं
खोज के परिणाम.
मैं ज्यादा दूर गया नही हूँ अभी किनारे की ओर
पर
कहाँ जाया जाता है मुझे नही पता
जब दुनिया बीच में हीं खत्म हो जाती है
पृथ्वी अपनी धूरी पे नही घूमती
दुनिया में मौसम नही बदलते
पतझर अटका हुआ रहता है शाखों पे
तुम्हारे जाने के बाद डालियों पे हरे पत्ते नही लौटे अब तक.
तो क्या हुआ गर
मेरी सांस चलती है
और उंगलियों में कलम पकड़ लेता हूँ
मुझपे तो कील रख के ठोक दिया गया
वक़्त का सरा ख़ालीपन
और छोड़ दिया गया है
अपने बहते लहू के सहारे.
मैं जाता हूँ उन दरारों में भी कभी कभी
जो मेरी दुनिया के अचानक दरकने से बनी है
और ढूँढता हूँ उस टूटी दुनिया के छोर को
जो खो गयी है
कभी कोई छोर मिल जाए गर तुम्हे
मेरी दरकी दुनिया के
तो खींच लाना उसे मुझ तक.
मैं तुम्हारा इंतिज़ार करूंगा.

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