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तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में



तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में

तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में
तुम हमेशा मुस्कुराती रहती हो वहाँ
तुम्हारी मुस्कान,
जिसे मैने अभी लाख चाहा
शब्दों में उतरने की
पर रहा नाकाम,
आँखों के पानी में हरकत करती रहती है हमेशा
ये अच्छा है की कुछ तस्वीरें तुम्हारी
हैं मेरे पास.

तुम्हारे बनाए हुए सलवटों के पास
छोड़ देता हूँ अपना बदन
रात के विस्तर पे
जहाँ सपनो को तेरी छुअन मिल जाती है

तुझे किए वादे तोड़े हैं मैने और
तेरे जाने के बाद रोया है कई बार.
और सिगरेट अब सिर्फ़ इसलिए पीता हूँ की
तुम कभी मना नही करती थी
हां अब जलता खुद हूँ हमेशा,
वो तो बुझ जाती है.


अब दिन बिना इंतेज़ार के गुजारनी पड़ती है
क्यूँ की शाम को तुम ऑफीस से लौट कर नही आती
और खाने के समय हाथ में नीवाला लेकर
दौड़ना नही होता
जैसा की तुम्हारी थाली छोड़ के उठ जाने पे
किया करता था मैं लगभग रोज
और तुम कभी-कभी बेसिन में
ऊगाल आया करती थी
और हम लड़ते थे फिर.
आज ये सब याद करके लिखते हुए
देख रहान हूँ होठों पे मुस्कुराहट आ गयी है.

बेशुमार इस्क बहा करता था साहिल पे
हर तन्हाई भरी रहती थी
इश्क की लहरें दूर तक भिगो आया करती थि ज़मीन.
आज याद करता हूँ
वो सब्ज़ शामें तो
आँखों में खारापन उतर आता है
और सारा समंदर एक बूँद में खाली हो गया लगने लगता है.

खबर मिलती रहती है
तेरे शहेर की तेलेविजन से
आज कल पारा ज़रा ज़्यादा गिर गया है वहाँ
मैने वो तुम्हारी रज़ाई ओअध लेता हूँ जब
ज़्यादा ठंध होती है.

तुम कुच्छ नये तस्वीर इंटेनेट पे अपलोड कर देना
वो नयी तस्वीर देखी थी तुम्हारी
जिसमे तुम पार्क में बेंच पे अकेली बैठी हो.

प्रतिक्रियाएँ

Re: तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में
आपकी कविताओं की मैं मुरीद हूँ...... .
अस्वीकरण