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फ़रवरी 2008

 

• एक नकारात्मक कविता

एक लम्बा अरसा हुआएक हल्की सी उम्मीद और एकाध मुस्कराहट के साथ वक़्त फांकते हुएधूल चटाने के हौसले खुद मिट्टी होने को हैंआवाज उठाने वाले सिर महजसिर हिलाने वाले न बन जायेये डर हैमुठ्ठियो में कसाव की जगहप्रार्थना लेने लगी हैबाजुओ में वो पहले से पंजे नही रहेदिल ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• ताल्लुकात

. ताल्लुकात सिमटते गयेधीरे - धीरे किताब के किरदारो से खुद से मिलता जुलता, कोइ मामुली साया कोइ हैरत अंगेज सा किरदारमिल जाया करते थे अक्सरकिताब के पन्नो मेंवे किरदार जीवित हैं आज भीऔर वक़्त-बेवक़्त मिल जाया करते हैकिसी सहारे की तरहऔर उंगली थाम कर चलने लगते ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• जाने क्यों !

उसने कहना छोड़ दिया और मैने भीवो सारे शोर जो कभी कमरे और उनसे निकल कर बरामदे में तक पहुँचते थे ,भीतर ही उमड़ने घूमड़ने लगे गुबार बनकरपरखिड़किया खुली नही किसी भी दिवार पे वे बरसे भी पर भीतर हीया किसी अलग कोने में जाकरपानी अलग अलग धाराओं में बह कर दूर निकल ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• कश में नहीं आयी

लबो पे हरकत करती रही पर कश में नहीं आयीहजार बार जलायीपर तलब जली नहीधुएँ बनते रहे हालाँकि रात कैक्टस के सिरहाने जागती रही आँखों में नींद चुभती रही यूँ ही पड़े पड़े थकता रहा समय कमरा धुएँ सा ही रहादीवारें सलेती होती रहींबहूत देर इंतज़ार किया परकोई नही आयान ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• दरारें

दरारें बनाती हैं ख्वाब नींद मेंएक लम्स छू गया था कल ख्वाब मेंसुहाने एक मौसम की तरहऔर उसे ढूँढता रहा हूँ मै नींद नींद आज कल कोई और छू जायेगा और कल कोई और तलाश ख्वाब कइ देखे और खोजा भी कि शायद रूबरू हो कभी पर कोई कितना भागे और किसके पीछेख्वाब भी तो ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• नींद से बिछड़ा हूँ मैं

एक नींद से बिछड़ा हूँ मैंएक ख्वाब का टुकड़ा हूँ मैं चील सी उड़ती हवाएँधूप जैसे चोट खाये कुछ संग थे जो अरमान वो अरमान बिखरते गयेसाथ में बिखरा हूँ मैं एक नींद से बिछड़ा हूँ मैंएक ख्वाब का टुकड़ा हूँ मैं हालात गिरते गयेरंगरेज उजड़ते गये धूप में धुंधले ...   और पढ़ें...
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• ताजे मौन देना

>ये बातें जिनका अस्तित्व मौन में है जीवित हैं इस उम्मीद में कि किसी दिन तुम्हारी छुअन इन्हे मिल जाए शायद. ये बातें किसी दायरे में नहीं उनके सपने हैं निराकार इन बातों का बयान सुना जाना है अभी बाकी ये बातें फ़िज़ा में भटकती रहती है बेचैनी से साँसें ...   और पढ़ें...
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• नन्ही कोंपल

तेरी शाख पे एक नन्ही ज़िंदगी अपनी नाज़ुक कोन्पल ले आई है ज़िंदगी की ये कोन्पल अभी अपने निर्मल आँखों की रोशनी से नाज़ुक हाथों की छुअन से परिमल मुस्कान से तुझमें आहलाद भर देगी तेरी यादों में इस पल का स्पर्श हमेशा नाज़ुक रहेगा छु लो इस पल को अपनी शाख का सारा ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• शरीर में टिके रहने की वजह

देती है साथ कोइ तमन्नाएक ख्वाहिश है जो नही जाती छोड़कर कभीकोइ ख्वाब है जो कभी रूठता नहीटूटता नही है एक नशा है जो उम्मीद का मन के आले में अरमानो का एक दीया है जो अपनी लौ नही समेटता एक जिंदगी है जो कभी मरती नहीऔर कितनी चाहिये वजहें इस शरीर में टिके रहने ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• एक रिश्ता जो ठहर गया

वो पानी नही ठहरा...... हजार दफा पोंछी आँख पर खामोश बहती रही बारिश की नजर मुसलसलगुबार के काले बादल बरस कर खाली हो गयेपरसुबकिया थमी नहींना सुबकिया ठहरी और ना वो पानी ठहरा एक रिश्ता था जो बस ठहर गया था   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• जानते थे वे नही आयेंगी

वो शाम का किनारा जिसके उस तरफ तुम्हारा समंदर डूब गया था और जिंदगी की सारी लहरें गायब हो गयी थी अचानक धूंधलके में उसी किनारे पे मेरी ख्वाहिशें ठहर गयी थीं. पूरा का पूरा जिस्म झोंक दिया एक छोटे पेट के वास्ते मुझे याद भी आईं बहुत बार, वो ठहरी हुई ख्वाहिश और ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• में रहूँ

मुद्दत से आरजू है की तेरी चाँदनी में रहूँ. तुम छेड़ो कोई तार की मैं जिसकी रागिनी में रहूँहर तरफ तेरी लिखावट हो और, मैं तो बस सदा उसकी स्याही में रहूँकभी उठे लहर तो गिरे कभी फिर उठने के लिए, मैं हमेशा उसके पानी में रहूँ. खुदा के रहेम-ओ-करम तुम पर मुसलसल ...   और पढ़ें...
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• गुनगुनी धूप

कुछ गुनगुनी धूप वाले मौसम होते हैं जो पसर जाते हैं जिंदगी की अलगनी पर कुछ इस तरह जैसे कि वे सारा पतझर ढांप लेंगें. तमाम उगे हुए दर्द और सुखी हुई तन्हाईयाँ गिरा कर वो भर देते हैं नंगी शाखों को कोंपलों से.कोयल कूकती है, पपिहे गाते हैंऔर योवन दुबारा पनपने ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• दिल को कोइ काम नही है

कहीं कोई मुककमल मोकां नही है जहाँ में कहीं भी चैन-ओ-आराम नही है. तुमने मसला उठाया है तो कह देता हूँ हम आशिकों से ज़्यादा कोई गुलफाम नही है. जिस साहिल के बदन पे समंदर अंगराईयाँ लेता है उस साहिल की भी कोई खुशनुमा शाम नही है आज फिर उनके जानिब से ना कोई पैगाम ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: ग़जल
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• पतझड़ और सीलन

पतझर में जो पत्ते बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से, वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं उन सूखे पत्तों की रूहें उसी आशियाने की दीवारों पे सीलन की तरह बहती रहती है किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नही ये नम बनी रहती है मौसम रिश्तों की रूहों को सूखा नही सकते.   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: सीलन
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• लुप्त होते ख्वाब

सुबह पर धूप ने अभी अभी चादर लपेटी है. दूब पर बैठे ओस के परिंदे अपने पर फैलाने लगे हैं. ख्वाब भी नींद की आरामगाह से निकल कर अपने-अपने तलाश में निकल करसड़कों पे दौड़ने लगे हैं. अपनी अपनी गति से, अपनी अपनी उम्मीद और धुन में, अपने अपने पेट्रोल के सहारे. एक ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• विस्थापित स्वर

कुछ स्वर,जो लब्जों के पनाह में जगह नही पातेउनखामोश स्वरों की रूहें सदियों तक,इंतिज़ार करती हैं की शायद कभी कोई आवाज़,कोई लब्ज उसे अपना जिस्म पहना दे और उन कानों तक पहुँचा देजिनके लिए उन्हे मौन में छोड़ा गया थास्वर मरते नही वे कहीं छूट जाते हैंमौन और लब्ज ...   और पढ़ें...
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• बीच से दरकी दुनिया

दुनिया किसी किनारे पे खत्म नही होती ऐसा कहते हैं खोज के परिणाम. मैं ज्यादा दूर गया नही हूँ अभी किनारे की ओर पर कहाँ जाया जाता है मुझे नही पता जब दुनिया बीच में हीं खत्म हो जाती है पृथ्वी अपनी धूरी पे नही घूमती दुनिया में मौसम नही बदलते पतझर अटका हुआ रहता ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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• तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में

तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में तुम्हें रख रखा है मेरी मेज पर फ्रेम में तुम हमेशा मुस्कुराती रहती हो वहाँ तुम्हारी मुस्कान, जिसे मैने अभी लाख चाहा शब्दों में उतरने की पर रहा नाकाम, आँखों के पानी में हरकत करती रहती है हमेशा ये अच्छा है की कुछ ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: थोड़ा सा आसमान
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