नींद आँखों में गिरती हीं नहीं.
साहिल पे गया था कल शाम को
रेत पे तेरा नाम लिख के आया था.
एक सुकून है तेरे नाम में
याद करता हूँ तो सांस आती है.
रिश्ते टूट कार अलग हो जाते हैं
तो शायद दो रिश्ते बन जाते हैं.
जो आशियाना हम नही बना सके
आजकल मैं उसी में रहता हूँ.
उस बालकनी से दिखता है समंदर
लहरों में मेरा अक्स भटकता है.

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प्रतिसाद