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इंकार करती हैं तेरी यादें फींकी पड़ने से



इनकार करती हैं
तेरी यादें फींकी पड़ने से .

दर्ज करती हैं ये

हर रात मेरे ख्वाबों पे अपना बोसा .

जिंदा करती हैं खामोशियों को

ये लबेन तेरी मेरे लबों पे गुलाब रखती हैं.

मैं इस पल में हूँ और ये बीती रैना

पर ये ज़्यादा जिंदा हैं .

तेरी ठहरी आवाज़ों पे कान रख के

अपनी कई तन्हाईयाँ काटी हैं मैंने

और सुबह सुबह उठ कर कई बार

बिस्तर की सलवटों में पाया है तुझे

मैने कहा था ना
कि तुम जा नही पओगि.

प्रतिसाद

Re: इंकार करती हैं तेरी यादें फींकी पड़ने से
क्या बात है ओम भाई..
Re: इंकार करती हैं तेरी यादें फींकी पड़ने से
आपकी कविताएँ पढ़ी, कोई अपनी ज़ुबाँ का कोई मिल गया-सा लगा...... आप गुलज़ार को पढ‌ते हैं?
अस्वीकरण