उनकी छुअन अब नही लगतीं वे खाली-खाली से रह गये मौसम हैं पेड़ो पे लद भी जाएँ तो शाखें नही झुकतीं वो जो धरती के सबसे नायाब मौसम थे, वो भरे-पुर महकते मौसम फ़िज़ाओं से जाने कैसे गायब होते गये. अब ना तो उनके स्पर्श घुमड़ते हैं आसमान में और, ना हीं उनकी बूंदे ...
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