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कुछ शब्द जो मेरे मौन के खाली घर में आते हैं उन्हें मैं आवाज के पनाह में लाने की कोशिश करता हूँ . बस यही करता रहा हूँ . और पढ़ें...

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हाँ नहीं पता नहीं

वेबदुनिया बहस
शिवसेना और राज ठाकरे की हरकतों पर राज्य और केन्द्र सरकारें चुप क्यों हैं?

वो आवाजें
मैं अपना नाम लेकर उसे आवाज देता रहा उसने मेरा नाम न अपने कानो पे रखा और ना ही लबो पे आने दिया तडपती रही वो आवाजें मैं अनसुना ही रहा और वो अनकही ही
बीज
हमने अपने दिल ही नही कुरेदे. ये सोंच कर कि हवा, पानी, रोशनी रोक ली जाएगी, बीज हमने दबाए ही नही माटी में और रोक दी सम्भावना किसी खूबसूरत रचना की. तब ख्वाब में उगे वे बीज वहाँ वे खिले,लहलहाए और मुस्कुराये खूब खुशबूएं बिखेरी वे बाहर भी आयी उनके ...
याद में
इस लड़खड़ाती रात में उसकी यादों की उंगली थामे चल रहा हूँ उसकी यादों का जिंदा वजूद मेरे हर गिरते पल को थाम लेता है याद में ये राहें इतनी व्यस्त नही हैं वहाँ प्यार से चलने के लिये जगह भी है और वक़्त भी उन पर जरा बेफिक्र हो कर चला जा सकता है याद में उसकी ...
पतझड़ और सीलन
पतझर में जो पत्ते बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से, वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं उन सूखे पत्तों की रूहें उसी आशियाने की दीवारों पे सीलन की तरह बहती रहती है किसी भी मौसम में ये दीवारें सूखती नही ये नम बनी रहती है मौसम रिश्तों की रूहों को सूखा ...
तेरे जलबो में
तेरे जलबो में डूबता हूँ रोज तेरे जलबो की गहराई बहुत है. तेरे लम्हों का हाथ छूट गया जबसे मेरी दुनिया में तनहाई बहुत है. तुम मुड़ जाओगे ये मालूम था मुझको साथ चलने को तेरी यादों की पडछाई बहुत है तेरे कदमो में सर रखना है मुझे क्या करूं पर, तेरे कदमो ...
टंगे रहेंगे
गुजरता रहेगा वक़्त पहले की तरह पर मौसम टंगे रहेंगे उन्ही सुखे पत्तों पर आर पार जाती रहेंगी झोंके बारिशो के लहू के तपिश और दबाब कम नही होंगे पसरती रहेगी धूप छत और आंगन के कंधों पर पर छू नही पायेगी उनकी छूअन सीलनो और दीमको को बहुत सारा पानी बह गया होगा ...
नींद से बिछड़ा हूँ मैं
एक नींद से बिछड़ा हूँ मैं एक ख्वाब का टुकड़ा हूँ मैं चील सी उड़ती हवाएँ धूप जैसे चोट खाये कुछ संग थे जो अरमान वो अरमान बिखरते गये साथ में बिखरा हूँ मैं एक नींद से बिछड़ा हूँ मैं एक ख्वाब का टुकड़ा हूँ मैं हालात गिरते गये रंगरेज उजड़ते गये ...